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Monday, 16 December 2019

जला दोगे.....



जला दोगे मेरे प्रश्न
मेरा उतावलापन
मेरा आक्रोश
मेरा घर
जला दोगे तालीम मेरी
मेरी सूरत
मेरा नाम
मेरी पहचान
जला दोगे मुझे भी किसी दिन
खाख करदोगे मुझे किसी चोराहे
पेट की आग से तुम संसार जलादोगे
क्या मुझमे छुपे ललकार को जलापाओगे
मैं राख से उठ खड़ा हो जाऊँगा
तेरी तरफ़ उसी वेग से क़दम बढ़ाऊँगा
तेरी लाठी, बंदूक़ नहीं डरा सकते मुझे
मैं हर दफे आवाज़ उठाऊँगा
जला दोगे मुझे पर
मेरे ख़्वाब कैसे जलाओगे
आवाज़ कैसे दबाओगे
~शौर्य शंकर

Thursday, 27 June 2019

हम चार भाई ...


हमारा अपना कोई घर नहीं
हम चार भाई
चले
सबसे बड़ा चला बनाने को एक
अकेला था
कुछ साल पहले ही चल बसा
कुछ सालों से मैं लगा हूँ
बनाने को एक घर
सबके साथ रहने को
अब चार मकान है
सब अलग रहते हैं
माँ थोड़ा-२ सब में रहती है
~शौर्य शंकर

Sunday, 23 June 2019

रोज़....



रोज़ उतारता
क़मीज़ बदन पे से
और टाँग देता
अपना आज खूटे पे
मैल और पसीने में
मेरी दिनचर्या
सवाल करती
मेरे नए मैं से
हर क़मीज़ में दर्ज
वक़्त घूरता है
नाराज़
सुबह अलग होता हूँ
कुछ जो अलग होता रोज़
टटोलता अपना शरीर
पर दिखता सब ठीक
खूँटों पे
उन क़मीज़ों में
धूल और पसीने में
हर दिन का ‘मैं’ टंग़ा है
कुछ घायल हैं
छल्ली हैं
लहू रिसता उनसे
क़तरा दर क़तरा
सूख जाता है
हर रविवार उतारता हूँ
खूँटों पे से खूद को
क़मीज़ के साथ
धूल
पसीना
आँसू
दर्द
दाग़ यादों के
हर दिन के
लाशों पे से
रगड़-२ के
धोता हूँ
नामों निशाँ
मिटा देता हूँ अपना
धूप मल के
उन्ही क़मीज़ों पे
अगले दिन के लिए
तय्यार कर देता हूँ
नई दिनचर्या को.....
~ शौर्य शंकर

Sunday, 21 April 2019

टिक, टिक, टिक.....

घड़ी के
हर एक टिक से
अगले टिक के बीच
सूरज के
हर एक पुंज से
दूसरे पुंज के बीच
दिल की
हर एक धड़कन से
दूसरे धड़कन के बीच
कुछ मेरा अपना
बहुत प्यारा सा
“ मैं”
कहीं खो जाता है
क़तरा-क़तरा सा रिसता हूँ
गोंद सा इस वकफ़े में
थोड़ा चमकता
फिर इतिहास हो जाता हूँ
मैं
दिन के उजाले मे
चकाचौंध आँखों से
टटोलता हूँ चेहरा
लगता है अपना सा
फिर ग़लतफ़हमी सोच
आँख मल के
सो जाता हूँ
मैं
कुछ उँगलियों पे
लगा रह जाता है
सुनहरे गुलाल सा शायद
फिर अगले ही पल
इत्तर सा कहीं
छू.... हो जाता हूँ
मैं
विलुप्त हो चुका है
क्या है
कैसा है
कहाँ रहता है
और कब होता है
क्या खाता
कहाँ सोता
किसी के साथ या
अकेले रहता है
कैसा दिखता है
लिबास
शक्ल
आवाज़
गंध
आँखों का रंग
इस टिक से टिक के बीच
समय का राक्षस हँसता है
थोड़ी और बूढ़ी होती
एक माँ का निकम्मा बेटा
इस शोर मे खो जाता है
थोड़ा और भटक जाता है
माँ से दूर हो जाता है
टिक, टिक, टिक.....
~ शौर्य शंकर

Monday, 14 January 2019

एक शक्ल दे दूँ....


मैं चाहता हूँ कि
एक शक्ल दे दूँ
गूँद के
भीनी यादों को
उन हर एक
लमहों पे पड़ी मिट्टी को
जो दरम्यान थी कबसे
उसे आज कोई आकार दे दूँ
कभी लगता है कि
कर दूँ सब बयान
सफ़ेद काग़ज़ पे उधेल
स्याही मे लपेट ख़ुद सा कर दूँ
या क़लम से उठा टाँग दूँ
सफ़ों पर और नज़्म कर दूँ
वैसे ही छोड़ देता महक
सिलबटओन में चादर की
बदलना नहीं चाहता
बेतरतीब ही अच्छा है
जो है, जैसा है, जितना है
दरम्यान हमारे......काफ़ी है
~शौर्य शंकर

Tuesday, 28 August 2018

मौन...



मौन
किसे कहते हैं मौन
उसकी परिभाषा क्या है
और जो परिभाषा है उसकी
किताबों में
क्या परिभाषित करती है
कैसे किसी शब्द या शब्दों के समूह से
किसी की अनुभूति या
उसकी उपस्थिति को
दर्ज कर सकते हैं
क्या हमारी अनुभूति इतनी आम
और सस्ती हो चुकी है कि
अनुभव करने के लिए
शब्दों का बोझ ढोना पड़ेगा
या क्या हम इतनी प्रगति कर चुके हैं कि
हर भाव, कल्पना, अनुभव को
किसी शब्द का जामा पहना के
उसको नए रंग, रूप, आकार में ढाल के
बिलकुल वैसा ही कर दे
जैसा हम उसे देखना और
दूसरों को प्रस्तुत करना चाहते हैं
बाज़ार में बेचने को
क्यूँ वो
ना किसी रंग
ना कोई रूप
ना कोई आकार का हो
क्यूँ नहीं उसे समझने , महसूस करने वाला
बिना इनके स्वीकार करे
~ शौर्य शंकर

Friday, 8 September 2017

क्यूँ मुश्किल है इतना....


क्यूँ मुश्किल है इतना
जैसा हूँ वैसा बने रहना
हर क्षन ख़ुद को वैसा बनाए रखना
क्षनो की गोद में बैठा नवजात
ऑक्सिजन की गोद में
छटपटाता, संघर्ष करता
अपनी नन्ही हथेलियों से ढकेलता है
विकराल रूपी समय को
क्यूँ इतना जटिल है
भोथा, कठोर, कटाक्ष, कुरूप है
सरल क्यूँ नहीं है
त्वचा का रंग याद नहीं
कोई किराएदार रहने लगा
कुछ दिनो से
वो रोज़ आता है
अंधेरे में लहूलूँहॉन
रोशनियों से बचके
शहर की
पीछा करते हैं
हथियार लिए
जगमगाते बड़े दाँत वाले कीड़े
अपने घुटनो में छुपा लेता है चेहरा
जो अब किसी और के
चेहरे सा नहीं दिखता
ताकि कोई पहचान ना ले उसे
चेहरे से
क्यूँ मुश्किल है इतना....
पता नहीं आँखें कैसी थी
पता नहीं आइने में
कैसा दिखता था
पता नहीं आइना
कैसा दिखता था
माँ कैसी दिखती थी??
~शौर्य शंकर

Thursday, 11 May 2017

किसी की....


किसी की यादें तकलीफ़ होती हैं तो ,

किसी की अकलीफ़ यादें होती हैं।


~ शौर्य शङ्कर 

Friday, 16 October 2015

" पता...... "



 हर पते को कितना कुछ पता होता है। 
 हर पते का अपना एक पता होता है।
                हर पते का कुछ नाम होता है। 
                एक नम्बर होता है।      
                कोई गली, कोई मौहल्ला होता है।
                किसी फलाना चौराहे से बायां या दायां होता है। 

हर पते का अपना रंग होता है। 
अपनी गंन्ध होती है। 
अलग पहचान होती है। 

                ढ़ेर सी  यादें होती है। 
                अनकही बातें होती हैं। 
कुछ चर्चे होते हैं। 
कुछ ख़बरें होती हैं। 
कुछ दबी रूदन होती है। 
कुछ ताज़ा ज़ख्म होते हैं। 

  पतों  से उनका  इतिहास, भूगोल, गणित न जाने कितनी चीज़ें जुड़ी होती हैं। 

हर गॉव , मौहल्ला, शहर में 
एक न एक ऐसी जगह होती है 
जहाँ एक पता पूछने वाले को 
कई पता बताने वाले बेल्ले 
मार्गदर्शक मिल जाते हैं। 

आज कल ये प्रजाति बहुत ही ज्यादा फल-फूल रहा है 
और ये ज़्यादातर चाय , पान , किराने ,नाई 
या कपड़े इस्त्री करने वालों के दूकान के आस-पास झुण्ड में पाए जाते हैं। 
जिनसे किसी का पता पूछने पर कुछ ऐसे पता बताते हैं … 


बेल्ला १. -अ.. . . ये. . . उस बरगद के पेड़ से सीधा साइकिल के दूकान से सटा हुआ है. . 
बेल्ला २. … हाँ  वो बूढी अम्मा के सामने वाला घर जिसकी बेटी छोटी जात के लड़के के साथ भाग गई थी ……
बेल्ला ३.  अबे वही न जिनके घर दो खूंखार कुत्ते भौंकते हैं.…
               जिनका भतीजा आतंकवादियों से लड़ते शहीद हो गया था.......... 
बेल्ला ४. नहीं बे…उससे पांचवा घर … मास्टर जी का पता खोज रहे हैं बे ....... 
बेल्ला २.  भगरू नाई के साथ वाली गली में बायें तरफ से दूसरा माकन ,
               जिसकी बहु ने खुद को जला लिया था.... 
बेल्ला १. वो ३ मंजिला माकन न …… 
बेल्ला ३  नहीं बे …मंदिर के पीछे लाल वाला घर , जिसमे वो खूबसूरत मेम रहती थी.………। 
बेल्ला २. जहाँ सफ़ेद एम्बेसडर कार खड़ी रहती है …
बेल्ला १. मैं भी तो वही बता रहा था …बरगद के पेड़ से सीधा साइकिल के दूकान से सटा हुआ है. . 

देखिये एक ही पते के कितने पते होते हैं 
जो पते का पता रखने वालों को भी नहीं पता 
जब तक कोई न पूछे 
पते का अपना पता नहीं होता 
कोई पूछे या न पूछे 
वहां जाए या न जाए 
वो रहता है इंतज़ार में वही 
इंतज़ार ही उसे हमेशा ज़िंदा रखता है 
पते को पता रखता है। 






~ शौर्य शंकर 







Tuesday, 20 January 2015

तू जो अगर छू दे माँ.....




अभी तो ये बस सफ़ों पे टंगे चंद लफ्ज़ हैं
तू जो इन्हें अगर छू दे माँ,
हर हर्फ़ गज़ल हो जाए

कभी समझा नहीं तेरी उन शफक़ नम आँखों को
वो आशुफ़्ता बयां करती
और मैं तुझे अनपढ़ समझता रहा

हथेलिओं की मिटती लकीरों को देख जब रो देता हूँ
मेरी हथेली को अपनी हथेलियों पे रख
मुस्कुराके माथा चूम लेती है मेरा

-शौर्य शंकर




कुछ यूँ मैं अब ....


कुछ यूँ खुद को आज़माने लगा हूँ 

इश्क़ की तासीर में खुदा पाने लगा हूँ 


आइने में मैं खुद को अब ये दिखाने लगा हूँ 
क्या इसीलिए मैं बिलावजह गुनगुनाने लगा हूँ 

लोगों के रक़ावत को फना कर धुएं में उड़ाने लगा हूँ 

इस कदर अब मैं तेरे इश्क़ को मुकम्मल बनाने लगा हूँ 



~ शौर्य शंकर 

Tuesday, 6 January 2015

तू दिखे है .....

बड़ी मुश्किलात दरपेश रही जवानी के कुछ साल
धड़कते दिल को भी थपकियाँ दे-दे सुलाते रहे

ये कसक तो दिल के परे थी हमारे
फिर भी दिल को तसल्ली दे-दे समझाते रहे

बड़ी ख़्वाहिश थी हमें किसी से इश्क़ करने की
मैं बेवक़ूफ़, चेहरों में ख़ुदा तलाशता रहा

तेरी रौशनी में, कोई भी बुत अब दिखे ही नहीं
चौंदयाई आँखों से अब सब साफ़ जो दिखे है

सब पूछे हैं तेरा नाम, मज़हब मेरे मेहबूब
मैं कुछ भी कहता नहीं, सब पंडित, इमाम से जो दिखे है

अब कोई आशिक़ हो तेरा तो बता भी दूँ
ये क्या समझेंगे मज़हब के साए में लड़ने वाले

तू तो आइना है रूह बन रहता है सबमे
क्या दिखेगा उन्हें जो खुद से ही मुख़ातिब हुए नहीं



~ शौर्य शंकर 

Wednesday, 24 December 2014

कैसे मिटाऊं ......

कैसे मिटाऊं तेरा चेहरा मैं दिल से अपने
जितना घिसूँ दिल वो उतना साफ़ दिखे है

न देखूं , न लिखूं , न बोलू मैं कुछ अब
तू ही तू जो मुझे अब हर जहाँ में दिखे है

तेरे लब कुछ यूँ मुझे परेशान करे है
ख़्वाब में रोज़ क्यों कर मुझे चूमा करे है

तू भाए है मुझे क्यों कर बहुत बूझूं न
तेरी हर फ़िज़ूल बात भी क्यों याद आया करे है

ख़ुदा भी क्यों खेले है मेरे दिल से, बूझूं न
जब नहीं कुछ दिल में फिर सब से क्यों मिलवाया करे है


~ शौर्य शंकर 

कोई तूफ़ान है....

कोई तूफ़ान है सीने में जो सांय-सांय करे हैं
मैं काबिल नहीं तो न सही, मेरे अलफ़ाज़ बयां करे है

हर हर्फ़ मेरा दर्द, मेरी आह बयां करे है
जिनपे लोग महफ़िल में 'शौर्य ' वाह-वाह करे है

तेरी लौ सीने में जली तो ख़्वाब बन गए
जो लौ में मैं हुआ राख तो मिसाल बन गए


~ शौर्य शंकर



Wednesday, 17 December 2014

पेशावर अटैक.....

उन मासूमों के याद में (पेशावर अटैक )...
किसी के आँखों का तारा था
किसी माँ का बेटा दुलारा था
किसी के आँगन में बजती पाजेब थी
किसी बूढ़े बाप का सहारा थी

किसी माँ का ख़्वाब खेलता था उसमे
किसी परिवार के उम्मीदों का किनारा था उसमे
किसी अंधी आँखों की रौशनी थी उसमे
किसी मुल्क़ का मुस्तकबिल सुनेहरा था उनमे

मुस्कुराके गले लिपट गए उस बारूद के वो
कैसा भोला बचपन खिलखिलाता था उनमे
क्या कसूर था उनका वो पूछेंगे भी नहीं
उन्हें क्या लेना क्या मेरा क्या तुम्हारा था उनमे

तुम भी तो किसी माँ की आँचल में खेलते थे
फिर क्यों सैकड़ों की कोख उजाड़ा है तुमने
उन फरिश्तों को तो पनाह मिल गई होगी खुदा के घर
ये तो बतादे, तुम्हारा क्या बिगाड़ा था उन्होंने

अब तो अच्छी लगती होंगी तुझे वो वीरान गलियाँ, वो घर
बारूद के टीलों पे जो रख दिया है ये शहर तुमने
जा देखले हर चौखट पे खाट उलटी खड़ी है
हर आँगन से चीखने की आवाज़ें तो सुनली होगी तुमने
अब बहादुरी का तमगा तो मिला ही होगा तुझे
पूरी इंसानियत को जो शर्मशार कर दिया तूने
वो करेंगा फैसला तेरा भी एक न एक दिन ज़रूर
 खुदा  करे न ज़मीन नसीब हो न आसमान ही तुझे  



~शौर्य शंकर 

Saturday, 13 December 2014

हूँ तो क्या ...

आज एक पुँज भर हूँ तो क्या
कल सूरज बन चमकना है मुझे

आज एक छोटी बूँद हूँ तो क्या
कल समन्दर सा अथाह बनना है मुझे

आज एक हवा का झोखा हूँ तो क्या
कल आंधी सा वेग पाना है मुझे

आज एकदम अकेला खड़ा हूँ तो क्या
कल पूरी दुनिया को अपना बनाना है मुझे

आज मैं ज़र्रा भर हूँ तो क्या
कल काएनात मुठ्ठी में लाना है मुझे

आज ही चलना शुरू किया है तो क्या
कल दूसरों का रास्ता बन जाना है मुझे

आज छोटा बुलबुला भर हूँ तो क्या
कल इसी से सपनो का इन्द्रधनुष बनाना है मुझे

आज ही लड़ना शुरू किया है मैंने तो क्या
कल इसी को सुनेहरा इतिहास बनाना है मुझे

~ शौर्य शंकर 

Sunday, 30 November 2014

हम वो हैं....

हम वो हैं जो वादों पे जिया करते हैं
कागज़ों पे जीने वाले अक्सर फ़र्ज़ी होते है


गले मिलो बात करो , कुछ वक़्त और गुजार लो
कल का क्या पता, फलक का तारा हो गया तो

लोग कई आएँगे तेरे दर पे कुछ न कुछ मांगने को
जो सब कुछ अपना छोड़ आए तो समझना मैं आया था

आज तेरे नूर-ए-कमर पे मरते होंगे लाखों
जब इनमे से कोई भी न हो तब मेरे पास चली आना

है दौलत तो क्या है तेरे पास ए दोस्त
मेरे जैसा जीने का अंदाज़ कहाँ से लाओगे

खूब ज़िद्दी होगा तू सही ए खुदा तो क्या
मैं भी क़यामत तक हार नहीं मानने का



~शौर्य शंकर

Friday, 28 November 2014

अब कुछ भी नहीं लिखूंगा ....






अब कुछ भी नहीं लिखूंगा ये ठाना था मैंने
फिर क्या था दोबारा इश्क़ हुआ और सब चौपट हो गया



~  शौर्य शंकर 

ये शहर में धुआँ-धुआँ सा क्यों है .....



दिल में छुपा रखा था सालों से तेरा इश्क़
अचानक ये शहर में धुआँ-धुआँ सा क्यों है

कभी कहा की इश्क़ है, कभी कहा नहीं
मैं ही भरमाया हूँ या कोई साया सा है

अब चाँद में भी तू ही दिखे है मेरे माशूक़
इतना तो बता दे आखिर इस मर्ज़ की दवा क्या है

वो बे-शर्म घुमते है शहर में हज़ार वादे तोड़ के भी
हमने तो बस इश्क़ किया ' शौर्य ' और चेहरा छुपाए घुमते हैं

~ शौर्य शंकर 

Friday, 21 November 2014

"सोच.."

कवि महान नहीं होता
कविता भी महान नहीं होती
न ही सुन्दर होती है


महान तो होता है
उसके उत्सर्जन का श्रोत
वो सोच
जहाँ से वो पनपता है


कवि तो बस
सोच के वीर्य को
अपने मस्तिष्क की कोख में
एक काया, स्वरुप प्रदान करता है

असमाजिक समाज , साम्प्रदायिकता , पूंजीवाद , भूक ,ग़रीबी , द्वेष के
तपिश में जब वो क़तरा-क़तरा पनपता है
और शब्दों की चमड़ी चेहरे पे ओढ़ता है
शिशु बनता है
जन्म लेता है


और जब
एक कंधे पे विवशता
दूसरे पे लाचारी लटकाए
भूखे किसान की हथेली में रखे
राशन कार्ड पे दर्ज़ नाम की स्याही
पसीने से धुल जाती है
तब छाले पड़े हथेलियों की लकीरों से
लहू बनके टपकता है

नाकामी , इर्षा, आत्मग्लानी की लू मे
झुलसता है, चीखता है
तब पेट-भर स्वांस से
बुलंद आवाज़ में  नारा लगाता है
"इन्किलाब ज़िंदाबाद "
और बूँद बन गिर जाता है
पल में मिट्टी में मिल राख़ हो जाता है

वही राख युवा जब अपने
मस्तक पे लगता है
हाथ में तिरंगा लिए
सड़कों पे उतर आता है
और दोहराता है
"इन्किलाब ज़िंदाबाद , इन्किलाब ज़िंदाबाद . .... "


तब वो महान हो जाता है
वो सोच " इन्किलाब " ले आता है . ....




~शौर्य शंकर