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Thursday, 26 December 2019

कितना आसान है....



कितना आसान है लोगों से झूठ बोलना
बस ख़ुद से मैं झूठ नहीं बोल पाता

माफ़ कर देता हुँ आसानी से लोगों को
बस ख़ुद को मैं माफ़ नहीं कर पाता

नहीं छलकने देता आँखों को किसी भी बात पर
बस माँ को उदास देख ख़ुद को मैं रोक नहीं पाता

~ शौर्य शंकर

Friday, 13 September 2019

चलो फिर मिलो.....




चलो
फिर मिलो
वहीं, उसी जगह
उसी पहर
जब सूरज उढेल देगा
उबलता पीतल आसमान पे
आम्मठ बनाने को, तभी
साँझ चुपके से कुतर देगी
थोड़ा बग़ल उसका और
एक आँख मींचे
हुलकेगी पार उसके
ठीक उसी पहर
बेर देखूँगा
चली आना
गरम कुछ पहन लेना
ठंड हो जाएगी बहुत
और आते हुएँ
एक हँसिया और ख़ाली बोतल
रंगीन काँच हो जिसका
पार दिखता हो
लेती आना
पोखर किनारे
महुए के पेड़ के आढ में
दूपक के बैठेंगे
इंतज़ार करेंगे दोनो
उन सुनहरे परछाइयों का
पायल, झूमके कुछ नहीं पहनना
उनसे शोर होता है
वो डर जाएँगे
वो आते हैं
कहीं-किसी और दुनिया से
हर अमावस
और उतार देते है
सुनहरी केचूलि
चमकती हुई
पोखर में कुछ खोजते हैं
बड़ी बेसब्री से
फिर पथराई आँखों से
मोती सा कुछ झाड़ देते हैं
एक-एक कर बिन लूँगा
चुपचाप सारी केचूलियाँ
और तुम उनसे
रंगीन बोतल भर लेना
गूप्प अंधेरे में
पगडंडियों से होते हुएँ
उसी बोतल की रोशनी से हमें
चाँद तक जाना है
मेरे साथ ही रहना
हाथ थामे
मेरे बग़ल में बैठी रहना
चुपचाप, दूपक के
हाँ अगर सीपियाँ मिले तो उठा लेना
ज़्यादा नहीं दो- चार ही काफ़ी है
उन्ही सीपियों से थोड़ा- थोड़ा कर
आसमान भरना है हमें चाँद में
सुनो ध्यान से काटना आसमान
थोड़ा -थोड़ा छोड़ देना
जड़ मत काटना
थोड़े ही दिनो में
फिर उग जाएगा आसमान
उन्ही जड़ों में कहीं - कहीं
केचूली रोप देना
वो चमकेंगे तो
थोड़ा बादल डाल झाँप देना
नहीं तो चीलें चुग लेंगी
बहुत पसंद है उन्हें
चलो थोड़ा सा ही सही
देख तो पाएँगे
एक दूसरे को
महसूस तो कर पाएँगे
पता नहीं कब से
श्राप से ग्रस्त हैं दोनो
कबसे देखा नहीं एक दूसरे को
बाहों में भरा नहीं
कब से रूठे नहीं
कब से मनाया नहीं
माथा चूम कर
गले से लगाया नहीं
अगर इस बार नहीं हुआ ऐसा
अगली अमावस फिर आना होगा
क़रीब ११बार में श्राप होगा ख़त्म
हमें ही इन्हें मिलाना होगा
बिना तुम्हारे नहीं कर पाउँगा ये काम
तुम्हें मेरे साथ फिर चाँद तक आना होगा
सुनो रविवार को चला करेंगे उनसे मिलने
दोनो के साथ बैठा करेंगे
पैर लटकाके बैठना
एक कोने तुम,दूसरे पे मै
थोड़ी देर चाँद पे
सी-सॉ खेला करेंगे
~शौर्य शंकर

Monday, 9 September 2019

Sunshine..

Sunshine..
I’s too naive to realize
What’s happening
In the world of darkness
I carry n ocean
Underneath my eyes
Dripping drop by drop
Rolled over my cheeks
Tasted , saline
In the cage of my heart
Shackled, bolted,locked
With no windows n doors
Through those cold walls
I’d feel your warmth though
Hugs, kisses on my face
I’s always remembering you
Walking across the rose garden
Hands with tangled fingers
I always thought
I’s living in the darkness
Fighting everyday
Doubted myself
To sail through
Until I met you
You made me see my path
You believed in me
The very moment
I laid my eyes on you
I found my light
Sunshine of my life
You torched something in me
A desire , a hope , a meaning
No darkness left inside
It’s Sunny, vibrant n bright
Fragrance of blossomed life
I can see my path now
Crystal clear
The sparkling golden light
always remind me of you
Your face over mine
Your shy eyes always shine
Warm smell of strawberry
Rising up through my mind
Tasted Lipstick you’re wearing
When Your lips stroked mine
Wearing your smell
Taking you in my arms
Your hands on my shoulders
Your Face dug deep in my chest
From that crack you peeped in
You became what you’re seeking
Two bodies becoming one
Two souls becoming one
You’re I
I’m you and
We’re us .
~ Shaurya Shanker

Friday, 15 March 2013

"मेरा मन कुछ दिनों से अकेले शहर घूम आता है "

मेरा मन कुछ दिनों से,
 अकेले शहर घूम आता है
ये बावला सा है कुछ ,
 मेरी बात सुनता ही नहीं।

किवाड़ पे दस्तक होते ही,
 रात का आँचल पकड़े, निकल पड़ता है
पूरी रात इधर-उधर,
 खाली डब्बे सा बेवजह ही घूमता रहता है ।

कभी किसी ठिठुरते बुढे को
अपने स्नेह की चादर ओढा आता है 
तो कभी उन् कोने में लाचार पड़े
 अंधेरे को, सड़क पार करवाता है।

 और जब डूबते बचपन को
नशे के भयानक भवर से बचाने जाता है,
 तो गिद्ध से घूरते,
 उन् खुंखार निगाहों पे लगे मुखौटे से, डर जाता है।

ये उतावला मन बेचैन है; कब से,
 किसी हिरन के बच्चे की तरह 
जो हर एक छोटी सी आहट पे
 आँख मीचे कोने में दुपक जाता है।

 कुछ देर बाद ही सही
पर दिल के आँगन में खुलती खिड़की से 
बच्चों के पायल की किलकारियों को सुन
 हल्का सा ही सही, पर मुस्कुराता है। 

उसके चेहरे पे खिची काँटों वाली
तारों की सरहद से चोरी -छुपे
 कोई असला-बारूद लिए, घुसता है,
 और एक पल में, कही छु हो जाता है। 

माथे पे पसीने की बूंदे
अब  कुछ ऐसे दिखते है 
जैसे खिड़की के कांच पे सरकती
 बारिश की बूँदें हों, धीरे-धीरे।

 और एक कोने से मुसलसल झांकती हैं,
 मन के अन्दर, चुपचाप
  जैसे कुछ कहना चाहती हो ,
 कोई दुःख, बांटना चाहती हो मुझसे। 


तभी किसी ने,
देसी तमंचे से एक गोली दागी,
वो ज़ख़्मी मोर तड़पता पिछली गली में
 बिन रहा था; अपने बिखरे साँसों के टुकड़ों को।  

जो बार-बार उठने की
नाकाम कोशिश कर रहा था 
आखिरकार कामयाब तो हुआ,
 पर, मरने के बाद। 

पुलिस आई है अभी
पूछताछ को गली में
तमंचे को लिए,
 जिसपे खून से सने उँगलियों के, निशाँ मिले हैं।

आज कल खौफ़
 खुले आम घूमता है शहर में 
लोगों को डराता हैं आते-जाते,
 बेख़ौफ़ रात-दिन। 

उन्ही सकरी गलियों में
अब खौफ़ के कुत्ते भी गुर्राते है 
खूनी पंजो से खरोच के समझाते हैं,
अपना मुह बंद रखने को।

 अब तो ओस भी
 तेज़ाब बन गिरती है पत्तों पे 
कोयल ने गाना, गाना
कब का छोड़ दिया है यहाँ। 

गौरैया भी शहर से
पलायन कर गयीं हैं,
अब बच्चों के रगों में भी
खौफ़ बहने लगा है यहाँ।

खौफ़ की फसल होती है
खौफ़ ही खेतों में उगते है यहाँ 
अब खौफ़ ही खाते और पीते हैं,
लोग यहाँ। 

अब ना ही
मेरा मन बेख़ौफ़ रहा 
ना ही घर से निकलता है कभी कहीं,
 पहले की तरह ..    



-शौर्य शंकर 
    



    

Sunday, 10 February 2013

"जहाँ अभी गोली चली थी"

अँधेरे की ऊनी चादर ओढ़े,
वो रात भयानक सी है.
जहाँ अभी गोली चली थी,
जहाँ थोड़ी देर पहले भगदड़ मची थी।
एक तरफ, गाड़ियों के टूटे कांच पड़े थे,
तो कहीं किसी की दुकान लुटी पड़ी थी।

एक तरफ कहीं आग की लपटें, मुंह खोले खड़ी थी,
तो दूसरी तरफ, उस गली के नुक्कड़ पर भिकारी की लाश पड़ी थी।
जिसे अभी-अभी पुलिस ले गई है, पोस्टमॉर्टेम के लिए।
और दहशत के पहरेदार गली में छोड़ गयी है।
डर भी अब छुपी दीवार की आड़ में,
कभी दरारों से झांकती, फिर छुप जाती है।

हवा भी आँख-मुंह-नाक-कान मींचे,
ठिठुरते बैठी है कोने में।
गली के नुक्कड़ पे बैठा,वो चौकीदार,
ऊँघता हुआ,जैसे अफ़ीम की रोटी खाई हो रात के खाने में।

तभी हवा ज़रा सी हिली,
आँखों से पलकों को दुकान की शटर जैसे
धीरे-धीरे ऊपर उठाया
और इधर-उधर फेरते,
जायज़ा लेते हुए,आँख थोड़ी और खोली।

नज़रों को थोड़ी दूर नुक्कड़ तक,
गश्त लगाने को भेजा, तो ख़याल आया,
इन चुप, अवाक् जगह में उसका क्या काम,
कहीं और चलती हूँ।

अपने हाथ खोले,सर ऊपर सीधा उठाये,
एक हाथ ज़मीन पर टिकाया,
दूसरा अपने ठंढे पड़े घुटने पर।
फिर ज़ोर लगा के उठी और एक बड़ी सी अंगड़ाई ली।

अचानक से पत्तों की सरसराहट
धुल के कणों की घबराहट,
हवा की अपनी हिचकिचाहट,
सब आपस में घुलने लगी।

वो धीरे-धीरे हलके कदम आगे की ओर रखने लगी।
और अगले ही पल सन्नाटों को महबूस* किये,
सांय-सांय इस गली से उस गली तक बहने लगी।
अचानक से गली का कुत्ता उठ बैठा,
चौंकीदार भी नशे से जाग गया।

कहीं दूर हल्की-हल्की रौशनी भी,
मकई के लावों* जैसी फूटने लगी,
अन्धकार को, रौशनी की छन्नी से छानने लगी,
कुछ लटके कपड़े दूर अब अकेले खड़े दिखने लगे।

चिड़ियों की बातें भी अब फिजां में उड़ने लगीं,
गिलहरियाँ भी अपने रोज-मर्रा के वर्जिस में जुट गयीं।
वहीँ कोने में मुंह छुपाये ख़रगोश,
बैठा ख़ल्वतों* में ना जाने, क्यों?
सूरज भी जम्हाई लेता समुन्दर की गोद से,
आँखों को मीचे, कनखियों से इधर-उधर देख,
ज़रा सी और खोलकर आँखों को, मलता उठा।

गली के एक कोने पे कुत्ते भोकने लगे ,
उन ग़लाज़त* से लिबास में लिपटी दो छोटी बच्चियां ,
अपने से भी बड़े बोरी लादे,
जिनमे मुसाइबों* के छोटे-छोटे गुड्डे लिए,
पन्नियाँ  बीनने निकली हैं।

कहीं-कहीं किसी घर के रसोईघर की बत्तियां जली,
अपने में बड़-बड़ाते बल्ब जो शायद उठना नहीं चाहते होंगे,
काफी हलकी रौशनी फेक रहे थे।
कुछ माँए आधी जगी, उठ गयी हैं,
अपने बच्चों के टिफ़िन बनाने को।

कहीं दूधिया अपनी साइकिल पे ,
बड़े-बड़े पीपे लादे,
नुक्कड़ से दुसरे घर के सामने रूका।
एक बूढी औरत जिसने झट से दरवाज़ा खोला ,
जैसे वो राह देख रही हो उसका।

अब उजाला ओस की बूंदों की तरह फ़ैल चुकी है,
लोग धीरे-धीरे घर को छोड़, सुबह से मिलने लगे।
बच्चे अपने स्कूल को और लोग पास के पार्क में टहलने लगे।
वहीँ उसी नुक्कड़ पे आज कोई और भिखारी बैठा दिखा,
कल के हादसे को लोग भूल, उन्ही ख़ून के धब्बों पे चलने लगे।

ख़ल्वतों*- एकांत
मकई के लावों* - मक्के के फुले
ग़लाज़त*- गंदे  
महबूस* -जकड़े/कैद
मुसाइबों*- दुःख


-शौर्य शंकर       

Saturday, 9 February 2013

बच्चे जो मेरे पड़ोसी हैं..

कुछ बच्चे जो मेरे पड़ोसी हैं,
बात करते हैं, मेरी और मेरे बुलेट की।

कुछ महाशय की तो ये राय है हमारे बारे में,
कि बुलेट वाले भैया बहोत गुस्से वाले हैं।
अरे तुमने देखा है,
वो कभी किसी से कुछ नहीं बोलते!

तो उनमे से दूसरा कहता,
मुझे तो उनकी आँखों से डर लगता है भाई।

तो तीसरा कहता,
अबे इसी लिए तो बुलेट खरीदी है उन्होंने।

तो चौथा, जो काफी देर से मौन बैठा था,
बातों के महाभारत में कूदा और बोला,
तुझे पता है, बुलेट चलाने के लिए कितनी ताक़त चाहिए,
पूरी लोहे की बनी होती है, बुलेट।
ये बात शायद उसके पापा ने उसे बताई होगी।

तो अगले ने कहा,
तुम्हे पता है, मेरी माँ कहती है,
की वो लम्बू!
वो तो "गुंडा है गुंडा"।

पर मेरी बहन को वो बहुत अच्छे लगते हैं,
वो रोज मुझसे उनका नाम पूछती है।
किसी को उनका नाम पता है क्या?

तो काफी देर सन्नाटे के बाद,
एक ने हिचकिचाते हुए कहा,
भाई उनका नाम पूछने की हिम्मत,
हममे से तो, किसी में नहीं है।

इस वार्तालाप के बाद,
सब एक दुसरे को गौर से देखने लगे।

तो कुछ ही मिनटों बाद,
उनमे से सबसे छोटे महाशय ने फ़रमाया,
तुम्हे पता है,
मैंने उनसे बात की है,
और उनकी बुलेट पर घुमा भी हूँ,
मुझे तो उनका नाम भी पता है।

पहले तो सब भौचक्के खड़े रहे,
फिर,
सबने मिलके उसका जम के मजाक उड़ाया,
और वो बिचारा रोता हुआ वहां से चला गया।

और मेरे और मेरे बुलेट की बातें वहीं पड़ी रह गयीं...

- शौर्य शंकर 

"भूल आया हूँ..."

खुद से बातें करते, आज बहुत दूर निकल आया हूँ,
अपने घर का पता भी, मैं भूल आया हूँ।

किनारे की एक छोर पकड़, उसके साथ यहाँ तक चला आया हूँ,
नदी के हाथ में, मैं पते की पर्ची भी भूल आया हूँ।

उन दूर उड़ते परिंदों का इशारा भी, समझ नहीं पाया हूँ ,
क्योंकि आज ऐनक भी मैं, मेज पर ही भूल आया हूँ।

अभी-अभी सुबह को, शाम के सुपुर्द करके आया हूँ,
पता नहीं ज़ल्दी में सिगरेट की डिब्बी, कहाँ भूल आया हूँ।

पानी पे तैरता चाँद, देखो अपने साथ लाया हूँ,
अरे बेवजह ही देर रात, उसे इतनी दूर लाया हूँ।

कई गाँव, रास्ते, पुल, लोग पीछे छोड़ आया हूँ,
वहीँ से पानी पे तैरती,चाँदी की गुलाल मुट्ठी में भर लाया हूँ।

रेत पे चलते नंगे पैरों के निशां, पीछे छोड़ आया हूँ,
उन घिसी चप्पलों को मैं, ना जाने कहाँ फिर भूल आया हूँ।

कोई और चलेगा उन राहों पर कभी ना कभी,
जहाँ अपने नए तिजर्बाओं* को चमकता छोड़ आया हूँ।

ले जायेंगे मेरे पैरों के निशां उन्हें भी वहीँ,
जहाँ अपने सफ़र का एक नन्हा पौधा, मैं बो आया हूँ।

आके बैठूँगा छाँव में मेरे सफ़र के दरख़्त तले,
जहाँ पर मैं अपना सबकुछ ख़्वाबीदा* छोड़ आया हूँ।

बैठूँगा कभी शाख पर तो कभी पत्तों पर,
अपने लिए जीने का यही सबब, साथ लाया हूँ।

खुद से बातें करते, आज बहुत दूर निकल आया हूँ,
अपने घर का पता भी, मैं भूल आया हूँ।



*तिजर्बाओं- तजुर्बा
ख़्वाबीदा - सोये

- शौर्य शंकर

भूख भागती है ज़ख़्मी...

भूख भागती है ज़ख़्मी,
अपने चेहरे पे, ग़रीबी का मुहर लगाये।
गली-गली कूंचे-कूंचे, यहाँ से वहां,
हर तरफ, दर-दर भटकती हुई।
राशन कार्ड मुट्ठी में दबाये,
बचती, छुपती, उन इंसानों से,
जो खड़े सिर्फ हँसते हैं,
एक साथ ज़ोर-ज़ोर से,
जिनके आवाज़ की आंधी,
कान में बने घोसले को कबकी उजाड़ चुकी है।
जिसके उजड़ने पर बेघर हो चुका है,
वो सफ़ेद कबूतर का जोड़ा,
जो उड़ने की कोशिश में
उसी बरगद के पेड़ के शाख से जा टकराया है,
जो नुक्कड़ पर, खड़ा है,
हाथ में महंगाई का चाबुक लिए...
जहाँ सर झुकाए लोगों का हुजूम,
ना कुछ बोलने की हिम्मत रखता है,
ना ही कुछ करने की।
जहाँ लोहे से बनी हिम्मत की बेलों में,
शुष्क हवा के कीड़े,
जंग लगा गए हैं,
जो सर उठाने की सोचते भी नहीं,
कि अपना आस्तित्व बचा सकें,
जो ना जाने कबका गर्त में मिल चुका है।

- शौर्य शंकर 

वो चाँदनी...

जब कभी सर्द रातों में,
गली के कुत्तों की आवाज़े,
नींद में ख़लल डालती हैं लोगों के,

और चाँदनी बादलों से उतर के,
गली के आवारा कुत्तों से बचती, छुपती,
खिड़की के कोने से झांकती है,
और कांच को टापते हुए,
मेरे बिस्तर तक, चुपके से आती है।

और वही पास रखे टेबल पे से,
जब पानी का ग्लास गिराती है,
तो कटोरी सी आँखों को मीचे,
चाँदी से दांतों तले उंगली दबाये,
चुपके से परदे के पीछे दुपक जाती है।

मेरे चौंक के उठने पर और इधर-उधर देखने पर,
जब कुछ भी आस-पास नहीं पाता हूँ,
तो मेरी उंघती आँखे, कोई बुरा सपना समझकर,
बिस्तर के आग़ोश में, खींच ले जाती है।

तो चाँदनी अपने ठन्डे हाथ-पैर लिए,
चुपके से, धीमे पांव,
मेरे बिस्तर तक आती है,
और वही कोने पर बैठकर,
मुझे निहारा करती है...

फिर धीरे-धीरे अपने ठिठुरते पैर
मेरी रज़ाई में, चुपके से डालते हुए,
थोड़ी घबराई, थोड़ी सहमी सी,
चुपचाप सी बैठी,
बदन गरमाया करती है।
वो चाँदनी...

-   शौर्य शंकर

Saturday, 2 February 2013

"मेरा साथ दोगी ना..".

जब मैं ज़िन्दगी के ऊँचे-नीचे, पथरीले रास्तों पर चलते थक जाऊंगा।
बोलो, तो तुम मेरा साथ दोगी ना...

जब ज़िन्दगी में कुछ ना कर पाने की झुन्झुलाहट, सबसे दूर ले जाएगी।
बोलो, तो तुम मुझे गले से लगाये सबके करीब लाओगी ना...

जब कभी मैं चलते-चलते राह से भटकने लगूंगा,
बोलो, तो तुम मेरा कान पकड़कर मुझे सही राह पर लाओगी ना...

जब किसी की बातें मेरा दिल रुलाने लगेंगी,
बोलो, तो तुम अपने  कंधे पर मेरा सर रख चुप कराओगी ना...

जब मैं जीवन की गाड़ी को खींचते, थका बेहाल सा थम जाऊंगा,
बोलो, तो तुम मेरा हाथ बटाओगी ना...

जब किस्मत के दिए छाले, मेरे हाथों की लकीरों को नाकाबिल बना देंगी,
बोलो, तो तुम उन्हें चूम के फिर से काबिल बनाओगी ना...

जब कभी कामयाबी का घमंड, काई बनकर मुझपर जमने लगेगी,
बोलो, तो तुम अपनी आगोश में मुझे पिघलाकर सोना बनाओगी ना...

जब मैं अपने मेहनत के ईंटो-गारों से सपनों का मकान बनाऊंगा,
बोलो, तो तुम अपने स्नेह और प्यार से उसे घर बनाओगी ना...

जब चलते पैर लड़खड़ाने लगें और मुझमें एक कदम और भी चलने की साहस नहीं होगी,
बोलो, तो तुम मेरा हाथ थाम मुझे हौसला दिलाओगी ना...

जब बुढ़ापा घेर लेगी मुझे और आँखों की रोशनी धुंधलाने लगेगी,
बोलो, तो तुम अपनी आँखों से दुनियां दिखाओगी ना...

जब  आस-पास ना दोस्त होंगे, ना माँ होगी, ना भाई होगा, ना कोई अपना होगा,
बोलो, तो तुम हाथ थामें मेरा साथ आखरी स्वांस तक निभाओगी ना...

-शौर्य शंकर 

चार दीवारी में लीपटे अँधेरे...

चार  दीवारी में लीपटे अँधेरे में, मै बैठा रहा,
उजाले से क्यूँकर मैं, कोसों दूर जीता रहा .

रोद (धूप) भी रोशनदान से छन के आती रही,
बेवफ़ाई के बने ताले पर धूल को सुलाती रही.

वो हवा भी अँधेरे में मुझे डराती रही,
ज़हन में रखी तेरी तस्वीर को हिलाती रही.

रात-दिन खुद को तुझसे नफ़रत करने को कहता रहा,
पर तेरे नाम को धड़कनो से लगाए रातभर सुनता रहा .

तेरे दिये रुमाल को देखकर मेरा दिल उसे चूमता रहा,
तेरे खुशबू के बिखरे फूल, कई दिनों तक मैं चुनता रहा.

लोगों की हमदर्दी से हर रोज़ मैं खुद को छुपाता रहा,
सब के नफरत से पल-पल मेरा शौर्य बुझता रहा.

पिघले सीसे सा अकेलापन मेरे नसों में बहता रहा,
आँखों से ख़ून के लावे को मैं यूँ ही निगलता रहा.

दर्द भी अब तो दस्तबस्ता* मुझसे गुज़ारिश करती रही,
ये बेइन्तेहा दर्द अब और देर तक झिलती नहीं.

अब घावों में कोई दर्द, कोई टीस रही नहीं,
ये हालत मेरी, मौत से भी क्यूँ देखी गई नहीं...

अरे मौत ने भी मुह फेर लीया है, अब तो,
अब और किसकी रुसवाई को मैं हूँ, मालूम नहीं...

क्यूँ तू मुझ बेइन्तेहा प्यार की मूरत लगी,
और शौर्य तुझे प्यार के काबिल लगा ही नहीं...

*दस्तबस्ता - हथजोड़

Thursday, 17 January 2013

" सर्द रातों में "


वो दिन याद है मुझे , आज भी ,
जब सर्द रातों में, सबसे नज़रें बचाके ,
रजाई में दुपके मन को अपने साथ लिए ,
हम उस चांदनी रात में झील किनारे मिलते थे।

उस लीची के पेड़ के नीचे खड़ी दुपट्टे में ,
ऐसी लगती ,जैसे कोई हंसनी चाँदी लपेटे खड़ी हो ,
जिसके मन से, बरखा बरसती मुझे देखने पर ,
तेरा  शर्माना, झिझकना चार चाँद लगा देता ,खूबसूरती में।

अपनी आँखों में मेरी तस्वीर लिए,
विचलित ,बेचैन सी राह तकती मेरा ,
मेरे आने पे , आँखों में चमकती वो बूंद ,
फिर मेरी छाती से तेरा लिपट जाना।

उस लालटेन की पिली रौशनी ओढ़े तुम,
मेरी ऊँगली पकड़ के, उन पगडंडियों पर चल देती ,
अपने सपनो के घर , जो वहां  दूर, उस नदी किनारे हैं ,
जहाँ सिर्फ तू , मैं और हमारे सपने उड़ते हैं, जुगनू बनके ।  




शौर्य शंकर                                                                                                                                                                                                                                                            


Tuesday, 15 January 2013

" तू आती क्यूँ नहीं "



मौसम आते है ,
कुछ दिन साथ -साथ रहते ,
फिर चले जाते हैं ,
वो तो ,हर साल मिलने आती है।
 तू आती क्यूँ नहीं ......

मुझसे पहले मेरे बस-स्टैंड पे आना ,
घंटों ,मेरी राह तकते रहना ,
एक ही बस में आना ,फिर जाना,
तेरी याद , आज भी मेरी पीछे आती है ,
तू  आती क्यूँ नहीं .....

मुझसे आँखे चुराना ,
फिर कनखियों से देखना ,
छुपके बात सुनना ,फिर दोस्तों से मेरी बातें करना ,
वो बातें तो मुझसे मिलने आती है,
तू आती क्यूँ नहीं .......

मुझे खेलते देखना ,
हर एक रन , विकेट लेने पर तालियाँ बजाना ,
कैच पकड़ते हुए मुझे चोट लगने पर,
तेरी आह दौड़ के मेरे पास आती है ,
तू आती क्यूँ नहीं ......

मेरा हमेशा ध्यान रखना,
ख़ुशी में हसना , परेशानी में उदास हो जाना ,
अपने रुमाल पे मेरा नाम लिखना ,छुप-छुप के उसे देखना ,
उस रुमाल की ख़ुशबू तो मिलने आती है ,
तू आती क्यूँ नहीं ......

मेरे जाने पे , मेरी जगह बैठे रहना ,
टेबल पे मेरा नाम लिखना ,एक-एक अखर को प्यार से सहलाना ,
चूमना उसे , फिर अपने मन में बसा लेना,
वो छुवन तो कभी-कभी मेरे पास  आती है,
तू आती क्यूँ  नहीं ......



शौर्य शंकर 



Thursday, 10 January 2013

" तेरी परछाई ......".

आँखें बंद किए बैठी है ,
उस टूटे मोड़े पे सुबह से।

              कभी अपने सीले हाथ ,
              तो कभी बदन सेकती।

अपने ख़ुले गीले बाल सुखाती ,
धूप के पंखड़ियों पर बैठी गर्माहट से ।

                                                     तेरी परछाई .......


दिन ढलने पर कभी - कभी मिलने आती है ,
और मेरी खिड़की पे, घंटों बैठी रहती है। 

               फिर कभी, एक आँख मीचे सीटी मारकर ,
               एक अलग ही अंदाज़ में , मुझे बाहर बुलाती है।

कभी हाथों में हाथ डाले घंटों , ज़ीरो-काटा खेलती  है,
आसमान के कोरे पड़े कागज़ के, एक कोने में ।
                                                  तेरी परछाई .......

कभी उन थके ,मंद पड़े तारों से बात करते ,
कुछ उनकी सुनते , कुछ  अपनी सुनाते।

              जब बादलों पे चढ़ते थक जाता हूँ  मैं  ,
             तो उसके गोद में, सर रख कुछ देर सो जाता हूँ  ।

कभी वो अपने आँचल के कोने से कान गुदगुदाती,  
तो कभी अपने लम्बे बाल मेरे चेहरे पे डाल देती।
                                             
                                                तेरी परछाई .......



चांदनी का पीछा करते अपने ही ख़यालों में,
हम बहुत  दूर तक निकल जाते, साथ -साथ ।

              उसके पंजे ,मेरे पंजों पर,उसके हाथ मेरे कंधों पर होते  ,
              जब कभी चलते-चलते दुखने लगते थे पैर उसके।

और हमारे आँखों के जोड़े सिमट जाते, एक  हो जाते ,
खो जाते , समा जाते , पिघल कर मोम हो जाती थी।





' शौर्य शंकर '


                                              

Sunday, 30 December 2012

" तनहाई में....."


तनहा था ,
तनहाई में फिरता था,
रास्तों से लड़ाई थी ,
कुछ क़दमों की ........

तनहा  था ,
तनहाई  में रोता था ,
आंसूओं से बेरूखी थी ,
कुछ लम्हों की .....


तनहा था ,
तनहाई में बैठता था ,
कुत्ते से याराना था ,
कुछ घंटों का ......


तनहा  था ,
तन्हाई में देखता था ,
उस लड़की से मोहब्बत थी ,
कुछ मिनटों की .....

तनहा था,
तन्हाई में लिखता था ,
उन् हर्फ़ों से ताररुफ़ थी ,
कुछ सफों की ....

तनहा था ,
तनहाई से खेलता था ,
मुंगफली से दोस्ती थी ,
कुछ 3 घंटों की .....



शौर्य शंकर

Monday, 24 December 2012

"मेरी माँ "


जब कभी मैं उलझता हूँ खुद से ,
मेरी ऊँगली पकड़ सुलझाती है , मेरी माँ ...

जब कभी मुझे ठेस कोई लग जाती है ,
ज़ख्म से निकलते ख़ून को देख कराहती है, मेरी माँ ...

जब कभी मैं जीवन की आपा-धापी से थक जाता हूँ,
अपने गोद में मेरा सर रख सुलाती है ,मेरी माँ ....

जब कभी मैं देर रात घर आता हूँ ,
पलकें बिछाए मेरी राह- तक जगती  है ,मेरी माँ ....

जब कभी मैं निराशा की रात में गुम होने लगता हूँ ,
नई उम्मीद की सुबह से रूबरू कराती है ,मेरी माँ .....

जब कभी दुनिया की कड़वाहट से जी उब जाता है मेरा ,
अपने प्यार से लिपटी मिशरी की डली खिलाती है ,मेरी माँ .....

जब कभी लोगों की बातें रूह तक छेद जाती है ,
मेरी पीड़ भी उधार ले जाती है ,मेरी माँ .....

जब कभी ज़िन्दगी की झुलसती धुप में पैर जलते है  मेरे ,
पैरों के छालों पर मल्हम लगाती है ,मेरी माँ ....

जब कभी बुरी नज़रें राह घेर लेती है मेरा,
काजल बन उनसे भी लड़ जाती है ,मेरी माँ .......



शौर्य शंकर

Saturday, 1 December 2012

जब मैं पैदा हुआ...

एक टक देखता, यहाँ-वहाँ।
सबकुछ, बिलकुल था नया,
देखूं जहाँ।

अनसुनी आवाज़े हर तरफ,
कभी न पहले देखे थे,
वो चेहरे।

सब पता नहीं,
क्यों खुश थे?
आँखे चमकती, घूरती, बड़ी-बड़ी, इधर-उधर,
सबकी ख़ुशी से।

हर तरफ,
आवाज़ के कुछ सिक्के,
खनकते, गिरते, लड़ते-झगड़ते से, बातें करते;
कुछ इस तरह, जैसे,
बधाई हो! बधाई हो! बधाई हो!!!

ये सबकुछ मेरी समझ से,
बिलकुल था परे।
मैं तो बस मुस्कुराता,
उन अजीब से चेहरों को देखकर।
जो बड़े डरवाने से लगते,
हँसते, नाचते, शोर करते।

सहल नहीं कुछ भी...

मैं, कागज़ और कलम हैं,
नज़रें, क्यों मेरी निश्चल हैं?
                 घूरता एक टक दीवार क्यों ?
                 ज़िन्दगी छिपकली की भी न सहल है .
मैं भुत्लाता सा जा रहा हूँ अब,
अँधेरे पड़े नींद के किसी गाँव में,
                 हर तरफ ठंडी रेत बिछी है,
                 पर ये तो मेरे पलकों की ही छाँव है .
ये रोशिनी किसके नज़रों की है,
रे पगले, ये तो अंधों का गाँव है।
                 फिर ये रोशनी सी क्या है?
                 शायद, चांदनी से भरी कोई नाव है।
देख तो, सपनों के पलंग पर बच्चे बैठे हैं।
वो धूप की पायल पहने, उनके ही पांव हैं।
                 हर बूँद, फिज़ा में उड़ती है यहाँ,
                 झिलमिल करती, इबादत की छांव है।
पानी में जुगनू तैरते हैं यहाँ,
घोड़े करते कांव-कांव हैं।
                 इन्द्रधनुष पर कबसे झूल रहा मैं,
                 अब तो सर नीचे, ऊपर लटकते मेरे पाँव हैं।

चलो जहाँ...

चलो जहाँ,
               चाँद की रोशनी हो,
               तारों की बातें हों।
                            भूतों के सपने हों,
                            परियों की यादें हों।
               कोई अनसुनी कहानी हो,
               जहाँ बचपन सी रवानी हो।


चलो जहाँ,
               रेत पर चलते छोटे नंगे पैर हों,
               हाथ में लटकाए जूते हों।
                            पैरों की हलकी निशानी हो,
                            किसी की उंगली हमने थामी हो।
               चारों तरफ बहता पानी हो,
               और नाव ,उस पार ले जानी हो।


चलो जहाँ,
               ख़्वाबों का काफ़िला हो,
               खुशियों की जवानी हो।
                            हवा कुछ सुहानी हो,
                            बादल भी दीवानी हो।
               मिटटी की प्रेम कहानी हो,
               और उस पर उमर बचकानी हो।

Sunday, 25 November 2012

तू...

मेरे रोम-रोम में समाई है,
              मेरी रूहानी परछाई है , तू।
मेरी ज़हन में फैली ग़फलत है,
              मेरा हाथ थामे चलती मज़हब है, तू।

मेरे नब्ज़ में बहते ख़ून की रवानी है,
              मेरे एहसासों की जीती-जाती कहानी है, तू।
मेरे प्यार के बुत की ताक़त रूहानी है,
              ख़ुदा के इबादत की मुहँ-ज़ुबानी  है,  तू।

मेरे हर साज़ में बजती राग-भोपाली है,
              मुझमें हर पल खिलती जवानी है,  तू।
मेरे दिल के झरने से बरसती अमृत का पानी है,
              गंगा किनारे की, कोई सुबह सुहानी है , तू।